आरुणि-श्वेतकेतु-संवाद

संस्कृत-गद्यांशों का सन्दर्भ- सहित हिन्दी में अनुवाद

1- येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमत। मतमविज्ञातं विज्ञातमिति । कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति ।।
न वै नूनं भगवन्तस्त एतदवेदिषुर्यद्धयेतदवेदिष्यन् कथं मे नावक्ष्यन्निति भगवाँ स्त्वेव में तद्ववीत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥
सन्दर्भ-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘आरुणि- श्वेतकेतु-संवाद’ नामक पाठ से अवतरित किया गया है।
हिन्दी अनुवाद – जो पढ़ने के बाद भी, शास्त्र श्रवणोपरान्त भी मौन होकर रहता हो । जो सिद्धान्त को समझने के पश्चात भी ना समझ (बुद्धिहीन) बनकर रहता हो । हे भगवान् ! यह बात मुझे इस प्रकार समझाइए जिससे मुझे ज्ञान (प्राप्त) हो। तब पिता ने कहा – “हे सौम्य !”
2- यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं कार्ष्णायसं विज्ञात्स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं कृष्णायसमित्येव सत्यमेवँसोम्य स आदेशो भवतीति ।।
यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञात्स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं लोहमित्येव सत्यम् ॥
सन्दर्भ-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक के ‘आरुणि- श्वेतकेतु-संवाद’ नामक पाठ से अवतरित किया गया है।
हिन्दी अनुवाद – जैसे एक नाखून से कटे हुए को जानने पर सभी पिघले लोहे जैसे जागतिक पदार्थ जान लिए जाते हैं। केवल वाणी के व्यवहार में नाम एवं रूप का ही भेद होता है। ऐसे ही ब्रह्म को जानने का विधि-विधान होता है। तथा हे सौम्य ! जैसे एक लोहमणि को जान लेने के अनन्तर लौह-निर्मित सभी पदार्थों को जान लिया जाता है, केवल वाणी का व्यवहार नामरूपात्मक परिवर्तन करता है लेकिन सत्य तो लोहा ही होता है। ईश्वर (ब्रह्म) को जानने के लिए यही विधि-विधान समझना चाहिए।

संस्कृत-पद्यांश (श्लोक) का सन्दर्भ- सहित हिन्दी में अनुवाद

1- । । ॐ । । श्वेतकेतुर्हारुणेय आस तं ह पितोवाच श्वेतकेतो वस ब्रह्मचर्यं न वै सोम्यास्मत्कुलीनोऽननूच्य ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति ।।
सन्दर्भ-प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी’ के ‘संस्कृत-खण्ड’ के “छान्दोग्य उपनिषद् षष्ठोध्यायः ‘ पाठ के अन्तर्गत ‘आरुणि-श्वेतकेतुः संवादः’ से उद्धृत है।
हिन्दी अनुवाद – आरुणि का पुत्र श्वेतकेतु था। उससे एक बार पिता ने कहा- ‘ श्वेतकेतु ! तुम ब्रह्मचर्य का पालन करो क्योंकि हमारे कुल में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं हुआ, जो ब्रह्मबन्धु के समान न लगता हो।
2- स ह द्वादशवर्षं उपेत्य चतुर्विंशतिवर्षः सर्वान्वेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध एयाय तं ह पितोवाच ।।
सन्दर्भ-प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी’ के ‘संस्कृत-खण्ड’ के “छान्दोग्य उपनिषद् षष्ठोध्यायः ‘ पाठ के अन्तर्गत ‘आरुणि-श्वेतकेतुः संवादः’ से उद्धृत है।
हिन्दी अनुवाद – बारह वर्ष पर्यन्त आश्रम जाकर चौबीस वर्ष आयु पर्यन्त श्वेतकेतु समस्त वेदों को पढ़कर स्वाभिमानी, पाण्डित्यमना, अहंकार युक्त होकर लौटा तो उसके पिता ने कहा।

संस्कृत प्रश्नोत्तर

1.क: ब्रह्मचर्यवासम् अकरोत् ?
उत्तर- श्वेतकेतुः ब्रह्मचर्यवासम् अकरोत्।
2. क: द्वादशवर्षम् उपेत्य चतुर्विंशतिवर्षः वेदानधीत्य आगतः ?
उत्तर- श्वेतकेतुः द्वादशवर्षम् उपेत्य चतुर्विंशतिवर्षः वेदानधीत्य आगतः।
3. श्वेतकेतुः कतिवर्षाणि सर्वान् वेदान् अपठत्?
उत्तर- श्वेतकेतुः द्वादशवर्षाणि सर्वान् वेदान् अपठत्।
4. अनूचानमानी कः अभवत्?
उत्तर- अनूचानमानी श्वेतकेतुः अभवत्।
5. मृत्पिण्डेन किं विज्ञातम् ?
उत्तर- मृत्पिण्डेन सर्वं मृण्मयं विज्ञातम्।
6. कुत्र लोहमयं विज्ञातम् ?
उत्तर-लोहमणिना लोहमयं विज्ञातम् ।
7. कः आरुणिं गुरुरूपेण स्वीकरोति ?
उत्तर- श्वेतकेतुः आरुणिं गुरुरूपेण स्वीकरोति ।
8. श्वेतकेतुः कस्य पुत्रः आसीत्?
या श्वेतकेतुः कः आसीत्?
उत्तर- श्वेतकेतुः आरुणेयपुत्रः आसीत्।