रसखान
जीवन-परिचय – श्रीकृष्ण के अनन्य उपासक, सरस काव्य के निर्माता कविवर रसखान वास्तव में, ही रस की खान थे। उनका सम्पूर्ण काव्य भी रस की खान है। रसखान का असली नाम सैयद इब्राहीम था। बाद में वैष्णव धर्म स्वीकार कर लेने पर इनका नाम ‘रसखान’ पड़ गया।
रसखान का पूरा जीवन अन्धकार के गर्त में छिपा है। अब तक इनके विषय में इतना पता चला है कि इनका जन्म सन् 1533 ई० के आसपास हुआ था। वे दिल्ली के पठान थे। कुछ विद्वानों ने इन्हें पिहानी का निवासी बताया है किन्तु इस विषय में कोई पुष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है । रसखान की ‘प्रेम-वाटिका’ नामक पुस्तक के निम्नलिखित दोहे से प्रतीत होता हैं कि ये किसी बादशाह के वंश से सम्बन्धित थे-
” देखि गदर हित साहिबी, दिल्ली नगर मसान ।
छिनहि बादशाह वंश की, ठसक छाँडि रसखान ॥”
कहते हैं कि रसखान को किसी स्त्री से प्रेम हो गया था किन्तु उस स्त्री ने इन्हें अपमानित कर दिया। इस कारण इन्हें वैराग्य हो गया। तब इन्होंने गोसाई बिट्ठलनाथ से दीक्षा लेकर वैष्णव धर्म स्वीकार कर लिया, तभी से इनका नाम रसखान हो गया। सन् 1618 ई० में इनका देहान्त हो गया ।
रचनाएँ- 1. प्रेम-वाटिका, तथा 2. सुजान-रसखान ।
सुमित्रानन्दन पन्त
जीवन-परिचय – सुमित्रानन्दन पन्त का जन्म सन् 1900 ई० में कौसानी ग्राम, जिला अल्मोड़ा (उत्तराखण्ड) में हुआ था। जन्म के छः घण्टे बाद ही इनकी माता का शरीरान्त हो गया। जिसके कारण वे प्राकृतिक वातावरण की तरफ आकृष्ट हुए। इनके पिता पं० गंगादत्त पन्त धार्मिक ब्राह्मण थे। प्रारम्भिक शिक्षा ग्राम की पाठशाला में हुई। हाई स्कूल की परीक्षा वाराणसी से उत्तीर्ण करके पन्त जी ने प्रयाग के म्योर सेन्ट्रल कॉलिज में प्रवेश लिया, किन्तु सन् 1921 ई० में असहयोग आन्दोलन आरम्भ होने पर उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया और साहित्य-साधना में लग गए तथा दीर्घकाल तक हिन्दी साहित्य की निरन्तर सेवा की। दिनांक 28 दिसम्बर, 1977 को उनका देहावसान हो गया। साहित्य अकादमी ने विशिष्ट साहित्यिक सेवा के लिए उन्हें पुरस्कृत किया तथा भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्मभूषण’ अलंकार से सम्मानित किया। उनकी कृति ‘चिदम्बरा’ पर भारतीय ज्ञानपीठ का एक लाख रुपये का पुरस्कार प्रदान किया गया।
रचनाएँ –वीणा, ग्रन्थि, पल्लव, पल्लविनी, अतिमा, गुंजन, युगान्त, युगवाणी, ग्राम्या, स्वर्णधूलि, उत्तरा, कला और बूढ़ा चाँद, युगपथ, शिल्पी, चिदम्बरा, ऋतु, लोकायतन, रश्मिबन्ध आदि ।
बिहारीलाल
जीवन-परिचय- रीतिकाल के महान कलाकार महाकवि बिहारी का जन्म सन् 1603 ई० में ग्वालियर के निकट ‘बसुआ गोविंदपुर’ नामक गाँव में हुआ था। ये मथुरा के चौबे थे। पिता का नाम ‘केशवराम’ था। आठ वर्ष की आयु में इनके पिता इन्हें अपने साथ ओरछा (बुन्देलखण्ड) ले गये। इनके गुरु आचार्य केशवदास थे।
बिहारी का बचपन ओरछा में बीता । युवावस्था में ये अपनी ससुराल मथुरा जाकर रहने लगे थे किन्तु ससुराल में उचित सम्मान न मिलने के कारण ये वहाँ से कन्नौज के राजा मिर्जा जयसिंह के दरबार में चले गये। वहाँ इन्हें पर्याप्त सम्मान मिला। कहते हैं कि उस समय राजा अपनी छोटी रानी के प्रेमपाश में फँसे हुए थे। वे राजकाज की सब चिन्ता छोड़ कर हर समय महल में पड़े रहते थे। तब बिहारी ने राजा के पास एक दोहा लिखकर भेजा –
“नहिं पराग, नहिं मधुर मधु, नहिं विकास इहि काल ।
अली कली ही सौं विंध्यो, आगे कौन हवाल ॥”
इस एक ही दोहे ने राजा की आँखें खोल दीं। वे ठीक से राज्य की देखभाल करने लगे। दरबारी जीवन में बिहारी को बहुत सम्मान मिला। कहा जाता है कि राजा जयसिंह बिहारी को प्रत्येक दोहे की रचना पर एक स्वर्ण मुद्रा (अशर्फी) पुरस्कार देते थे । सन् 1663 ई० में इस महाकवि का परलोकवास हो गया।
रचना – बिहारी की एकमात्र रचना है- “बिहारी सतसई” ।
तुलसीदास
जीवन-परिचय – हिन्दी साहित्याकाश के दैदीप्यमान नक्षत्र महाकवि तुलसी के जन्मकाल तथा स्थान के विषय में विद्वानों में मतभेद है। अन्तः और बाह्य साक्ष्यों तथा लोककथाओं के आधार पर इनके विषय में इतना पता चलता है कि इनका जन्म सन् 1532 ई० (सं० 1589 वि०) में बाँदा जिले के राजापुर गाँव में हुआ था । ‘गोसाईं चरित’ के अनुसार तुलसी का जन्म (सं० 1554 वि०), सन् 1497 ई० में हुआ था । इनके जन्म-स्थान के विषय में भी विभिन्न मत हैं। कुछ विद्वान एटा जिले के ‘सोरों’ नामक स्थान को तुलसी का जन्म-स्थान मानते हैं।
तुलसी की माता का नाम ‘हुलसी’ तथा पिता का नाम आत्माराम दुबे था। कहते हैं जन्म लेते ही तुलसीदास रोये नहीं, उनके से ‘राम’ निकला, इस कारण पिता ने इनका नाम रामबोला रख दिया । इनका जन्म अभुक्त मूल नक्षत्र में हुआ था । अत: अशुभ जान कर माता-पिता ने बालक को ‘मुनिया’ नाम की दासी को दे दिया। मुनिया नामक दासी ने ही बचपन में इनका पालन-पोषण किया। कुछ बड़ा होने पर मुनिया ने यह बालक महात्मा नरहरिदास को सौंप दिया। नरहरिदास जी ने इन्हें पाला और शिक्षा दी। व्याकरण तथा वेदान्त आदि की शिक्षा इन्होंने काशी जाकर ‘शेष सनातन’ नामक आचार्य से प्राप्त की । तुलसीदास जी का विवाह दीनबन्धु पाठक की पुत्री ‘रत्नावली’ से हुआ। एक दिन पत्नी की फटकार सुनकर वे संसार से विरक्त हो गये और घर-द्वार छोड़ कर रामभक्ति में लीन हो गये।
काशी में अस्सी घाट पर सं० 1680 वि० (सन् 1623 ई०) में इन्होंने पंचभौतिक शरीर को त्याग दिया।
रचनाएँ- 1. रामलला नहछू, 2. वैराग्य-संदीपनी, 3. रामाज्ञा-प्रश्न, 4. जानकी-मंगल, 5. रामचरितमानस, 6. पार्वती-मंगल, 7. गीतावली, 8. विनय पत्रिका, 9. श्रीकृष्ण-गीतावली, 10. बरवै-रामायण, 11. दोहावली, तथा 12. कवितावली ।
सुभद्राकुमारी चौहान
जीवन-परिचय- उच्च कोटि की कवयित्री सुश्री सुभद्राकुमारी चौहान का जन्म सन् 1904 ई० में इलाहाबाद के ‘निहालपुर’ मुहल्ले में हुआ था। इनके पिता श्रीरामनाथ एक विद्वान व्यक्ति थे। सुभद्रा जी की प्रारम्भिक शिक्षा इलाहाबाद में ही हुई। पन्द्रह वर्ष की अवस्था में इनका विवाह श्री लक्ष्मण सिंह के साथ हो गया। विवाह के पश्चात सुभद्रा जी ने वाराणसी के थियासोफिकल स्कूल में प्रवेश लिया किन्तु कुछ ही समय पश्चात असहयोग आन्दोलन छिड़ जाने पर सुभद्रा जी पढ़ाई छोड़ कर आन्दोलन में सम्मिलित हो गयीं । स्वतन्त्रता संग्राम में इन्होंने सक्रिय भाग लिया। मध्य प्रदेश विधानसभा की ये सदस्या रहीं। भारत की देशभक्त महिलाओं में सुभद्रा जी का नाम अग्रगण्य है। सन् 1948 में 12 फरवरी के दिन हिन्दी साहित्य गगन की यह कान्तिमयी तारिका सदा के लिए अस्त हो गयी।
रचनाएँ- 1. झाँसी की रानी, 2. वीरों का कैसा हो वसन्त, 3. मुकुल, 4. बिखरे मोती, 5. त्रिधारा, 6. सभा का खेल, 7. उन्मादिनी, तथा 8. सीधे-सादे चित्र ।
