भगवतशरण उपाध्याय
जीवन-परिचय – डॉ० भगवतशरण उपाध्याय का जन्म सन् 1910 ई० में बलिया जिले में ‘उजियारीपुर में हुआ था। प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त कर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। प्राचीन इतिहास विषय में एम०ए० की उपाधि प्राप्त की। तत्पश्चात लखनऊ संग्रहालय में पुरातत्त्व विभाग में अध्यक्ष पद पर कार्य किया। कुछ समय लखनऊ संग्रहालय में पुरातत्त्व विभाग के अध्यक्ष पद को भी अलंकृत किया। इसके बाद पिलानी में बिड़ला महाविद्यालय में प्राध्यापक पद को सुशोभित किया। विक्रम विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग में पहले प्रोफेसर तत्पश्चात अध्यक्ष पद पर कार्य किया। सन् 1982 ई० में आपका परलोकवास हो गया।
रचनाएँ – विश्व – साहित्य की रूपरेखा, साहित्य और कला, खून के छींटे, इतिहास के पन्नों पर, कलकत्ता से पीकिंग, कुछ फीचर कुछ एकांकी, इतिहास साक्षी है, ठूंठा आम, सागर की लहरों पर, विश्व को एशिया की देन, मन्दिर और भवन, इंडिया इन कालिदास आदि ।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
जीवन-परिचय – हिन्दी के आलोचना सम्राट आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म सन् 1884 ई० में बस्ती जिले के अन्तर्गत ‘अगोना’ नामक गाँव में हुआ था। इनके पिता पं० चन्द्रबली शुक्ल सुपरवाइजर कानूनगो थे। शुक्ल जी इण्टर की परीक्षा उत्तीर्ण कर कानूनगो की परीक्षा में बैठे किन्तु सफल नहीं हुए। इसके बाद आप स्कूल में अध्यापक हो गये। ‘हिन्दी शब्द सागर’ के आप सहायक सम्पादक रहे। यहीं रहते हुए आपने अत्यन्त खोजपूर्ण ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ लिखा जिस पर इन्हें हिन्दुस्तानी अकादमी से 500 रुपये का पारितोषिक भी मिला था । इसके पश्चात शुक्ल जी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक नियुक्त हुए और डॉ० श्यामसुन्दर दास के अवकाश ग्रहण करने पर हिन्दी विभाग के अध्यक्ष पद को सुशोभित किया। इस पद पर रहते हुए सन् 1941 ई० में दमा रोग से पीड़ित होने से आपका परलोकवास हो गया । निःसन्देह पं० शुक्ल एक गम्भीर चिन्तनशील सरस स्वभाव के व्यक्ति थे । वे एक निष्पक्ष आलोचक, श्रेष्ठ निबन्धकार और एक प्रतिभाशाली कवि भी थे।
रचनाएँ – विचार वीथी, चिन्तामणि, सूरदास, रस मीमांसा, त्रिवेणी, हिन्दी साहित्य का इतिहास, जायसी-ग्रन्थावली, तुलसी ग्रन्थावली, हिन्दी शब्द सागर और नागरी प्रचारिणी पत्रिका आदि ।
पदुमलाल पुन्ना लाल बख्शी
जीवन-परिचय – हिन्दी के श्रेष्ठ पत्रकार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म 21 जून, सन् 1894 ई० में मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले के खैरागढ़ नामक ग्राम में हुआ था। वे विद्यार्थी जीवन से ही कविताएँ रचते थे। बी०ए० पास करते ही उन्होंने ‘सरस्वती’ में अपनी रचनाएँ प्रकाशित कराना प्रारम्भ किया। बाद में ‘सरस्वती’ के अतिरिक्त अन्य पत्र-पत्रिकाओं में भी उनकी रचनाएँ प्रकाशित होने लगीं। उनकी कविताएँ स्वच्छन्दतावादी थीं, जिन पर अँग्रेजी कवि वर्डस्वर्थ का स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित होता है। बख्शी जी की प्रसिद्धि का मुख्य आधार आलोचना तथा निबन्ध लेखन है।
बख्शी जी ने 1920 से 27 तक बड़ी कुशलता से ‘सरस्वती’ पत्रिका का सम्पादन किया। कुछ वर्षों तक उन्होंने ‘छाया’ नामक मासिक पत्रिका का भी संपादन बड़ी योग्यता से किया।
वे अदम्य साहित्य-सृजन तथा साहित्य-सेवा करते हुए 28 दिसम्बर, 1971 को इस संसार से परलोक सिधारे।
रचनाएँ – शतदल और अश्रुदल , झलमला और अंजलि आदि
