ईर्ष्या, तू न गयी मेरे मन से(रामधारी सिंह ‘दिनकर’)

निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित दिए, गए प्रश्नों के उत्तर हल सहित |

गद्यांश -1

ईर्ष्या का यही अनोखा वरदान है। जिस मनुष्य के हृदय में ईर्ष्या घर बना लेती है, वह उन चीजों से आनन्द नहीं उठाता, जो उसके पास मौजूद हैं, बल्कि उन वस्तुओं से दुःख उठाता है, जो दूसरों के पास हैं। वह अपनी तुलना दूसरों के साथ करता है और इस तुलना में अपने पक्ष के सभी अभाव उसके हृदय पर दंश मारते रहते हैं। दंश के इस दाह को भोगना कोई अच्छी बात नहीं है। मगर, ईर्ष्यालु मनुष्य करे भी तो क्या? आदत से लाचार होकर उसे यह वेदना भोगनी पड़ती है।
(क) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
उत्तर :(क) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य पुस्तक में संकलित एवं श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा लिखित ‘ईर्ष्या, तू न गयी मेरे मन से’ नामक निबन्ध से उद्धृत है।
(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए ।
उत्तर :(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या प्रस्तुत अंश में लेखक ने बताया है कि ईर्ष्या अपने भक्त को एक विचित्र प्रकार का वरदान देती है और वह सदैव दुःखी रहने का वरदान है। जिस मनुष्य के हृदय में ईर्ष्या उत्पन्न हो जाती है, वह अकारण ही कष्ट भोगता है। वह अपने पास विद्यमान अनन्तसुख-साधनों के उपभोग द्वारा भी आनन्द नहीं उठा पाता; क्योंकि वह दूसरों की वस्तुओं को देख-देखकर मन में जलता रहता है।
(ग). ईर्ष्यालु मनुष्य क्या करता है ?
उत्तर :(ग) ईर्ष्यालु व्यक्ति अपनी तुलना ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों से करता है जो उससे किन्हीं बातों में श्रेष्ठ हैं। जब वह देखता है कि अमुक वस्तु दूसरे के पास तो है, लेकिन उसके पास नहीं है, तब वह स्वयं को हीन समझने लगता है। अपने अभाव उसे खटकने लगते हैं और वह अपने पास मौजूद वस्तुओं अथवा साधनों का भी आनन्द नहीं ले पाता।
(घ)ईर्ष्यालु मनुष्य को कौन-सी वेदना भोगनी पड़ती है ?
उत्तर:(घ) ईर्ष्यालु व्यक्ति रात-दिन इसी वेदना में जला करता है कि अमुक वस्तु दूसरों के पास तो है लेकिन उसके पास नहीं है। ईर्ष्या की इस दाह में जलना बहुत बुरा है, लेकिन ईर्ष्यालु व्यक्ति को यह वेदना भोगनी ही पड़ती है।

गद्यांश -2

ईर्ष्या की बड़ी बेटी का नाम निन्दा है। जो व्यक्ति ईर्ष्यालु होता है, वही बुरे किस्म का निन्दक भी होता है। दूसरों की निन्दा वह इसलिए करता है कि इस प्रकार, दूसरे लोग जनता अथवा मित्रों की आँखों से गिर जाएँगे और जो स्थान रिक्त होगा, उस पर मैं अनायास ही बैठा दिया जाऊँगा।
(क) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
उत्तर:(क) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी’ के ‘गद्य-खण्ड’ में संकलित एवं श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा लिखित ‘ईर्ष्या, तू न गयी मेरे मन से’ नामक निबन्ध से उद्धृत है।
(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या – दिनकर जी का मत है कि जैसे ही हमारे मन में ईर्ष्या की भावना जन्म लेती है, वैसे ही निन्दा की भावना भी उत्पन्न हो जाती है। इसीलिए निन्दा को ईर्ष्या की बड़ी बेटी अथवा पहली सन्तान कहा गया है। जो व्यक्ति किसी के प्रति ईर्ष्यालु होता है, वह अत्यन्त बढ़ा-चढ़ाकर उसकी बुराई करता है। उसकी बुराई करने में उसे आनन्द का अनुभव होता है। वह चाहता है कि अन्य लोग भी उस व्यक्ति की बुराई करें। उसके निन्दा करने का उद्देश्य यह होता है कि वह व्यक्ति दूसरे लोगों की दृष्टि में गिर जाये। जब वह व्यक्ति, जिसकी वह निन्दा कर रहा है, अपने मित्रों अथवा समाज के लोगों की नजरों में गिर जाएगा तो उसके द्वारा किये गये रिक्त और उच्च स्थान पर वह बिना परिश्रम के अधिकार कर लेगा।
(ग) ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों की निन्दा क्या सोचकर करता है?
उत्तर:(ग) ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों की निन्दा यह सोचकर करता है कि जब निन्दित व्यक्ति समाज की नजरों से गिर जाएगा तब उसके स्थान पर वह स्वयं विराजमान हो जाएगा।
(घ) ईर्ष्या के साथ और कौन-से अवगुण पनपते हैं?
उत्तर:(घ) ईर्ष्या ही निन्दा जैसे गुणों की जन्मदात्री है। ईर्ष्या का भाव मन में उत्पन्न होने पर निन्दा का अवगुण स्वयमेव पनपने लगता है।

गद्यांश -3

मगर ऐसा न आज तक हुआ है और न होगा। दूसरों को गिराने की कोशिश तो अपने को बढ़ाने की कोशिश नहीं कही जा सकती। एक बात और है कि संसार में कोई भी मनुष्य निन्दा से नहीं गिरता । उसके पतन का कारण सद्गुणों का हास होता है। इसी प्रकार कोई भी मनुष्य दूसरों की निन्दा करने से अपनी उन्नति नहीं कर सकता। उन्नति तो उसकी तभी होगी, जब वह अपने चरित्र को निर्मल बनाये तथा अपने गुणों का विकास करे।
(क) प्रस्तुत गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
उत्तर:(क) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी’ के ‘गद्य-खण्ड’ में संकलित एवं श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा लिखित ‘ईर्ष्या, तू न गयी मेरे मन से’ नामक निबन्ध से उद्धृत है।
(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या – लेखक का कथन है कि जो व्यक्ति ऊँचा उठना चाहता है, वह अपने ही अच्छे कार्यों से ऊँचा उठ सकता है, दूसरों की निन्दा आदि करके कभी कोई ऊपर नहीं उठ सकता। यदि किसी व्यक्ति का पतन होता है तो किसी की निन्दा से नहीं, अपितु उसके अच्छे गुणों के नष्ट हो जाने के कारण होता है। इसलिए उन्नति के लिए आवश्यक है कि मनुष्य निन्दा करना छोड़ दे और अपने चरित्र को स्वच्छ बनाये तथा अपने अन्दर मानवीय गुणों का विकास करे।
(ग) कौन-सी बात है जो आज तक न हुई है और न होगी ?
उत्तर:(ग) दूसरों को नीचा दिखाने के प्रयास द्वारा स्वयं को ऊँचा उठाने की प्रक्रिया न आज तक सफल हुई है और न होगी।

गद्यांश -3

चिन्ता को लोग चिता कहते हैं। जिसे किसी प्रचण्ड चिन्ता ने पकड़ लिया है, उस बेचारे की जिन्दगी ही खराब हो जाती है, किन्तु ईर्ष्या शायद चिन्ता से भी बदतर चीज है; क्योंकि वह मनुष्य के मौलिक गुणों को ही कुंठित बना डालती है।
(क) प्रस्तुत गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
उत्तर:(क) प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘हिन्दी’ के ‘गद्य-खण्ड में संकलित एवं श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा लिखित ‘ईर्ष्या, तू न गयी मेरे मन से’ नामक निबन्ध से उद्धृत है।
(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या – लेखक कहता है कि लोग चिन्ता को चिता के समान जलाने वाली कहते हैं। चिता तो मृत देह को ही जलाती है, परन्तु चिन्ता जीवित व्यक्ति को ही जला देती है। चिन्तित मनुष्य का जीवन अत्यधिक कष्टप्रद तो अवश्य हो जाता है, किन्तु ईर्ष्या उससे भी अधिक हानिकारक है; क्योंकि वह दया, प्रेम, उदारता जैसे मानवीय गुणों को ही नष्ट कर देती है। इन गुणों के बिना मनुष्य का जीवन ही व्यर्थ हो जाता है।
(ग) ईर्ष्यालु और चिन्तातुर व्यक्ति में कौन अधिक बुरा है और क्यों ?
उत्तर: (ग) चिन्ताग्रस्त व्यक्ति का जीवन खराब हो जाता है लेकिन ईर्ष्यालु व्यक्ति उससे भी अधिक बुरा है; क्योंकि ईर्ष्या तो व्यक्ति के मौलिक गुणों को ही समाप्त कर देती है।