इंटरमीडिएट – लेखक परिचय -2

प्रो० जी० सुन्दर रेड्डी

जीवन परिचय-प्रो० जी० सुन्दर रेड्डी का जन्म सन् 1919 में दक्षिण भारत में हुआ था। हिन्दी के अतिरिक्त इनका अधिकार तमिल तथा मलयालम भाषाओं पर भी था। इन्होंने बत्तीस वर्षों से भी अधिक समय तक आन्ध्र विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष पद को सुशोभित किया।
साहित्यिक परिचय-प्रोफेसर जी० सुन्दर रेड्डी की साहित्यिक सेवा, साधना और निष्ठा सभी कुछ प्रशंसनीय है। यद्यपि आप हिन्दीतर प्रदेश के निवासी हैं तथापि हिन्दी भाषा पर आपका अच्छा अधिकार है। आपके ‘हिन्दी और तेलुगु : एक तुलनात्मक अध्ययन’ में साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियों तथा प्रमुख साहित्यकारों का अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम दक्षिण भारत की चार प्रमुख भाषायें हैं, आपने इन चारों में ही साहित्य रचना की तथा इन चारों भाषा के साहित्यों का इतिहास प्रस्तुत करके अपनी प्रखर प्रतिभा का परिचय दिया है। आपकी इस कृति के सम्बन्ध में उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व राज्यपाल डॉ० बी० गोपाल रेड्डी ने लिखा है कि यह ग्रन्थ तुलनात्मक अध्ययन के क्षेत्र का पथ-प्रदर्शक है।
रचनाएँ- रेड्डी जी की अभी तक निम्नलिखित रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं-
(1) साहित्य और समाज, (2) मेरे विचार, (3) हिन्दी और तेलुगू : एक तुलनात्मक अध्ययन, (4) दक्षिण की भाजायें और उनका साहित्य, (5) वैचारिकी शोध और बोध, (6) तेलुगु-वेलुगु दारुल, (7) लेंग्वेज प्रोब्लम इन इण्डिया (सम्पादित अंग्रेजी ग्रन्थ) आदि । इस दक्षिण भारतीय अहिन्दी भाषी साहित्यकार ने अपनी अद्वितीय लेखन शैली के आधार पर हिन्दी साहित्य जगत में अपना उत्कृष्ट स्थान बना लिया था ।

कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर

जीवन परिचय – कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ का जन्म सन् 1906 ई० में देवबन्द (सहारनपुर) के एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम पं० रमादत्त मिश्र था। वे कर्मकाण्डी ब्राह्मण थे। प्रभाकरजी की आरम्भिक शिक्षा ठीक प्रकार से नहीं हो पाई; क्योंकि इनके घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। इन्होंने कुछ समय तक खुर्जा की संस्कृत पाठशाला में शिक्षा प्राप्त की। वहाँ पर राष्ट्रीय नेता आसफ अली का व्याख्यान सुनकर ये इतने अधिक प्रभावित हुए कि परीक्षा बीच में ही छोड़कर चले आए और राष्ट्रीय आन्दोलन में कूद पड़े। तत्पश्चात् इन्होंने अपना शेष जीवन राष्ट्रसेवा के लिए अर्पित कर दिया। सन् 1930 ई० से 1932 ई० तक और सन् 1942 ई० में ये जेल में रहे। इस अवधि में इनका सम्पर्क के महान् नेताओं से हुआ। भारत के स्वतन्त्र होने के बाद इन्होंने स्वयं को पत्रकारिता में लगा दिया। लेखन के अतिरिक्त अपने वैयक्तिक स्नेह और सम्पर्क से भी इन्होंने हिन्दी के अनेक नए लेखकों को प्रेरित और प्रोत्साहित किया। 9 मई, सन् 1995 ई० को इस महान् साहित्यकार का निधन हो गया।
साहित्यिक परिचय -हिन्दी के श्रेष्ठ रेखाचित्रकारों, संस्मरणकारों और निबन्धकारों में प्रभाकरजी का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। इनकी रचनाओं में कलागत आत्मपरकता, चित्रात्मकता और संस्मरणात्मकता को ही प्रमुखता प्राप्त हुई है। पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रभाकरजी को अभूतपूर्व सफलता मिली। पत्रकारिता को इन्होंने स्वार्थसिद्धि का साधन नहीं बनाया, वरन् उसका उपयोग उच्च मानवीय मूल्यों की स्थापना में ही किया ।
स्वतन्त्रता आन्दोलन के दिनों में इन्होंने स्वतन्त्रता सेनानियों के अनेक मार्मिक संस्मरण लिखे। इन संस्मरणों में भारत के स्वाधीनता संग्राम का इतिहास स्पष्ट हुआ है और इनमें युगीन परिस्थितियों और समस्याओं का सजीव चित्रण भी हुआ है। इस प्रकार संस्मरण, रिपोर्ताज और पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रभाकरजी की सेवाएँ चिरस्मरणीय हैं।
रचनाएँ – प्रभाकरजी के कुल 9 ग्रन्थ प्रकाशित हुए हैं—
(1) रेखाचित्र – (1) नई पीढ़ी के विचार, (2) जिन्दगी मुस्कराई, (3) माटी हो गई सोना, (4) भूले-बिसरे चेहरे ।
(2) लघु कथा – (1) आकाश के तारे, (2) धरती के फूल ।
(3) संस्मरण-दीप जले-शंख बजे ।
(4) ललित निबन्ध – (1) क्षण बोले कण मुस्काए, (2) बाजे पायलिया के घुँघरू ।
(5) सम्पादन – प्रभाकरजी ने ‘नया जीवन’ और ‘विकास’ नामक दो समाचार-पत्रों का सम्पादन किया। इनमें इनके सामाजिक, राजनैतिक और शैक्षिक समस्याओं पर आशावादी और निर्भीक विचारों का परिचय मिलता है।
इनके अतिरिक्त ‘महके आँगन चहके द्वार’ इसकी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कृति है ।

वासुदेवशरण अग्रवाल

जीवन परिचय – श्री वासुदेवशरण अग्रवाल का जन्म सन् 1904 ई (सं० 1961 वि०) में काशी के एक सम्पन्न अग्रवाल य) परिवार में हुआ था। प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद आप उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रविष्ट हुए और वहीं से बी०ए० की परीक्षा पास की। इसके पश्चात लखनऊ विश्वविद्यालय से एम०ए०, पी-एच०डी० तथा डी.लिट्. की उपाधियाँ प्राप्त की।
साहित्यिक परिचय- आपने संस्कृत, पाली तथा प्राकृत भाषाओं तथा प्राचीन भारतीय साहित्य का गम्भीर अध्ययन-मनन या इतिहास तथा पुरातत्व विज्ञान के आप प्रकाण्ड पण्डित थे। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में आपने पुरातत्व विभाग के अध्यक्ष आचार्य पद को सुशोभित किया। सन् 1967 ई० (सं० 2024 वि०) में आप परलोक सिधार गये।
रचनाएँ- निबन्ध संग्रह-कल्पवृक्ष, पृथ्वीपुत्र, भारत की एकता, माताभूमि पुत्रोऽहं पृथिव्याः ।
(क) आलोचना ग्रन्थ— पद्मावत की संजीवनी व्याख्या तथा हर्षचरित का सांस्कृतिक अध्ययन ।
(ख) इतिहास – पाणिनिकालीन भारतवर्ष ।
डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल एक महान टीकाकार, पुरातत्वज्ञ, अनुसन्धानकर्ता, ललित निबन्धकार एवं सम्पादक के रूप में हिन्दी साहित्य में अपनी मौलिकता के कारण सदैव याद किये जायेंगे