मैथिलीशरण गुप्त
साहित्यिक परिचय – श्री मैथिलीशरण गुप्त का जन्म सन् 1886 ई० में चिरगाँव (जिला झाँसी) में हुआ । इनके पिता रामचरण गुप्त महान रामभक्त तथा काव्यप्रेमी थे। इन्हें राष्ट्र कवि की उपाधि से भी विभूषित किया गया , गुप्त जी ने केवल नौवीं कक्षा तक शिक्षा पाकर स्कूल छोड़ दिया। बाद में कर पर गम्भीर अध्ययन किया। गुप्त जी का खान-पान, रहन-सहन तथा वेशभूषा सब कुछ भारतीय है। 1948 ई० में आगरा विद्यालय ने और 1958 ई० में प्रयाग विश्वविद्यालय ने गुप्त जी को डी० लिट्० की मानद उपाधि प्रदान की। राष्ट्रपति डॉ० राजेन्द्रप्रसाद ने इन्हें स्वतन्त्र भारत की प्रथम राज्य परिषद का सदस्य मनोनीत किया। कवि के रूप में इस युग में जो सम्मान और जो लोकप्रियता गुप्त जी को प्राप्त हुई, वह किसी कवि को नहीं मिली। 1964 ई० में उनका स्वर्गवास हो गया।
कृतियाँ- रंग में भंग, जयद्रथ वध, पद्य प्रबन्ध, भारत-भारती, शकुन्तला, पद्मावती, वैतालिकी, किसान, पंचवटी, स्वदेश संगीत, मौर्य तेग बहादुर, हिन्दू शक्ति, सैरन्ध्री, वन वैभव, बक संहार, झंकार, साकेत, यशोधरा, द्वापर, सिद्धराज, नहुष, विकट भट, विजय, मंगलघट, त्रिपथगा, गुरुकुल, काबा और कर्बला, अजित, कुणाल गीत आदि। विरहिणी ब्रजांगना, मेघनाद-वध, हिडिम्बा, का युद्ध तथा उमर खैयाम की रुबाइयाँ इनकी अनूदित कृतियाँ हैं।
अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'
साहित्यिक परिचय- अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ आधुनिक युग के महान कवि थे । आपका जन्म संo 1922 वि० (सन् 1865 ई०) में निजामाबाद जिला आजमगढ़ में हुआ। 14 वर्ष की आयु में मिडिल पास कर आप क्वींस कालेज (काशी) में भरती हो गये। अस्वस्थ हो जाने के कारण वे इच्छा रहते हुए भी अंग्रेजी का उच्च ज्ञान तन कर सके, संस्कृत में अवश्य उन्होंने पूर्ण विद्वत्ता प्राप्त कर ली थी। लगभग 5 वर्ष तक स्थानीय मिडिल स्कूल में अध्यापक रहने के बाद आप कानूनगो हो गये और इसी पद पर निरन्तर 20 वर्ष तक काम करते रहे। हिन्दी से उन्हें अत्यन्त स्नेह था और उसके लिए बड़े से बड़ा त्याग करने को तैयार रहते थे। कानूनगोई से अवकाश ग्रहण करने पर आप हिन्दू विश्वविद्यालय, काशी में अवैतनिक अध्यापक के रूप में कार्य करने लगे और हिन्दी को समृद्ध, विकसित तथा व्यापक बनाने के प्रयत्नों में नये स्वभाव से आप बड़े सज्जन, उदार और मधुरभाषी थे। अभिमान आपको छू तक भी नहीं गया था। आपने खड़ी बोली हिन्दी का प्रथम महाकाव्य प्रियप्रवास’ हिन्दी जगत को भेंट किया जो अपने ढंग का निराला है। इस ग्रन्थ पर ‘हरिऔध’ जी को हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्रदान किया। सम्मेलन ने इन्हें ‘साहित्य वाचस्पति’ की उपाधि से भी अलंकृत किया। सन् 1945 ई० में आपने इस पार्थिव शरीर को त्याग दिया।
कृतियाँ- हरिऔध जी ने गद्य और गद्य, दोनों प्रकार की कृतियाँ की हैं। उनकी प्रमुख कृतियाँ निम्नलिखित हैं-
महाकाव्य- प्रियप्रवास, वैदेही वनवास । जुट
मुक्तक काव्य-चोखे-चौपदे, चुभते-चौपदे, रस- कलश, बोलचाल, पद्य-प्रसून, कल्पलता, प्रेमाम्बु-प्रवाह, प्रेम-पुष्पोपहार आदि
आलोचनात्मक ग्रन्थ-हिन्दी भाषा और साहित्य का विकास, कबीर-वचनावली की आलोचना, रस-कलश आदि की भूमिकाएँ।
उपन्यास-ठेठ हिन्दी का ठाठ, अधखिला फूल, 5. नाटक- प्रद्युम्न-विजय, रुक्मिणी परिणय।प्रेमकान्ता ।
हरिऔध जी की रचनाओं में देशसेवा, समाज सेवा तथा राष्ट्रप्रेम की भावनाएँ प्रखर रूप में विद्यमान हैं। द्विवेदी कवियों में इन्हें बहुत ऊँचा स्थान प्राप्त है
रामधारी सिंह 'दिनकर'
साहित्यिक परिचय – श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जन्म सन् 1908 ई० में बिहार प्रदेश के मुँगेर जिले के अन्तर्गत सेमरिया’ नामक गांव में हुआ था। पटना विश्वविद्यालय से ऑनर्स के साथ बी०ए० परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद मोकामा घाट के हाईस्कूल में प्रधानाचार्य रहे। 1934 ई० में बिहार सरकार के रजिस्ट्रार नियुक्त हुए। 1950 ई० में मुजफरनगर कॉलेज में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष पद को सुशोभित किया। बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति तथा बिहार विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष पद पर रहे। डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने इन्हें राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया। 1959 ई० में इन्हें भारत सरकार ने ‘पद्मभूषण’ की उपाधि तथा ‘उर्वशी’ काव्य पर ‘दिनकर, एक लाख रुपये का ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया।
वास्तव में ‘दिनकर’ जी सुप्त चेतना को जागृत करने वाले ओजस्वी कलाकार हैं। वे समाज में हैं। अपने समय के हिन्दी कवियों में ‘दिनकर’ जी सबसे महान राष्ट्रवादी कवि हैं। ‘संस्कृति के चार अध्याय’ गद्य ग्रन्थ पर इन्हें आमूल क्रान्ति लाना चाहते साहित्य अकादमी ने पुरस्कृत किया। ‘दिनकर’ जी का गद्य साहित्य भी इनके काव्य की ही भाँति सजीव तथा जागरूकता से पूर्ण है। 1974 ई० में इनकी असामयिक मृत्यु हो गयी।
कृतियाँ – कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, प्रणभंग, उर्वशी, बारदोली विजय, धूपछाँह, बापू, इतिहास के आँसू, मिर्च का मजा, दिल्ली, रेणुका, हुँकार, रसवन्ती, द्वन्द्व गीत, सामधेनी, धूप और धुआँ, नीम के पत्ते, नील कुसुम, सीपी और शंख, नये सुभाषित, चक्रवात, धार के उस पार, आत्मा की आँखें, हारे को हरि नाम, मिट्टी की ओर, अर्धनारीश्वर, रेती के फूल, भारतीय संस्कृति के चार अध्याय ।
