निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित दिए, गए प्रश्नों के उत्तर हल सहित |
गद्यांश - 1
पुतला इसलिए उसकी भुजाओं में सौंप दिया कि मुझे मालूम था कि मैं धृतराष्ट्र से मिल रहा हूँ । पिछली रात को एक मित्र ने बताया कि ‘क’ अपनी ससुराल आया है और ‘ग’ के साथ बैठकर शाम को दो-तीन घंटे तुम्हारी निन्दा करता रहा। इस सूचना के बाद जब आज सवेरे वह मेरे गले लगा तो मैंने शरीर से अपने मन को चुपचाप खिसका दिया और निःस्नेह, कँटीली देह उसकी बाँहों में छोड़ दी। भावना के अगर काँटे होते तो उसे मालूम होता कि वह नागफनी को कलेजे से चिपटाए है। छल का धृतराष्ट्र जब आलिंगन करे तो पुतला ही आगे बढ़ाना चाहिए।
(क) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
उत्तर-(क) प्रस्तुत गद्यांश प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री हरिशंकर परसाई द्वारा लिखित ‘निन्दा रस’ नामक व्यंग्यात्मक निबन्ध से उद्धृत है। यह निबन्ध हमारी हिन्दी की पाठ्यपुस्तक के गद्य भाग में संकलित है।
(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-(ख) लेखक कल्पना करते हैं कि यदि भावना भौतिक रूप में शरीर के ऊपर दिखाई देती और वह काँटोंयुक्त होती तो मेरे मित्र को तुरन्त पता चल जाता कि मैंने किसी सहृदय व्यक्ति को गले नहीं लगा रखा है, बल्कि अपने प्रति दुर्भावना से परिपूर्ण नागफनी के पौधे को अपनी छाती से लगा रखा है। मगर यहाँ लेखक मित्र के प्रति अपनी दुर्भावना को उचित ठहराते हुए कहते हैं कि जब कोई छली व्यक्ति गले मिले तो उसके सामने अपना पुतला ही बढ़ाना चाहिए; अर्थात् उसके साथ जैसे को तैसा सिद्धान्त के अनुसार कपटपूर्ण ढंग से बे-मन से ही गले मिलना चाहिए।
(ग) लेखक अपने घर आए मित्र को क्या समझकर उससे गले मिले?
उत्तर-(ग) लेखक अपने घर आए मित्र को धृतराष्ट्र समझकर उससे गले मिले।
(घ) यहाँ धृतराष्ट्र का उल्लेख किस महाकाव्यकालीन घटना के सन्दर्भ में किया गया है?
उत्तर-(घ) यहाँ धृतराष्ट्र का उल्लेख इस महाकाव्यकालीन घटना के सन्दर्भ में किया गया है कि धृतराष्ट्र- पाण्डवों की विजय पर भीम को गले लगाते समय उसे मार डालना चाहा था। धृतराष्ट्र के इस मनोभाव को समझकर ही श्रीकृष्ण ने धृतराष्ट्र के सामने भीम के स्थान पर उसका लौहनिर्मित पुतला खड़ा कर दिया था। इसी प्रकार लेखक ने धृतराष्ट्र का उल्लेख करके यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि जो व्यक्ति हमारा भला नहीं चाहता, उससे केवल शरीर से ही छलपूर्वक गले मिलना चाहिए। मन से उस पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।
(ङ) लेखक के अनुसार जब कोई छली व्यक्ति मिले तो हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर-(ङ) लेखक के अनुसार जब कोई छली व्यक्ति मिले तो उसके सामने अपना पुतला ही बढ़ाना चाहिए. अर्थात् बे-मन से ही उससे गले मिलना चाहिए।
गद्यांश - 2
मेरे मन में गत रात्रि के उस निन्दक मित्र के प्रति मैल नहीं रहा। दोनों एक हो गए। भेद तो रात्रि के अन्धकार में ही मिटता है, दिन के उजाले में भेद स्पष्ट हो जाते हैं। निन्दा का ऐसा ही भेदनाशक अँधेरा होता है। तीन-चार घंटे बाद, जब वह विदा हुआ तो हम लोगों के मन में बड़ी शान्ति और तुष्टि थी।
(क) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
उत्तर-(क) प्रस्तुत गद्यांश प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री हरिशंकर परसाई द्वारा लिखित ‘निन्दा रस’ नामक व्यंग्यात्मक निबन्ध से उद्धृत है। यह निबन्ध हमारी हिन्दी की पाठ्यपुस्तक के गद्य भाग में संकलित है।
(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-(ख)दोनों की भावनाएँ समान हो गईं और हमारा स्वाभाविक भेदभाव भी समाप्त हो गया; क्योंकि इस प्रकार के भेद दोषरूपी अन्धकार में दिखाई नहीं देते और स्वच्छ आचरणरूपी दिन में स्पष्ट हो जाते हैं।
(ग)लेखक के मन में निन्दक मित्र के प्रति मैल क्यों नहीं रहा?
उत्तर-(ग) लेखक के मन में अपने निन्दक मित्र के प्रति मैल इसलिए नहीं रहा; क्योंकि जब उसने मेरे विरोधियों की निन्दा करनी प्रारम्भ कर दी तब तो मेरे मन में उसके प्रति कोई दुर्भावना नहीं रह गई। उस समय हम दोनों की भावनाएँ समान हो गईं और हमारा स्वाभाविक भेदभाव भी समाप्त हो गया।
(घ) दो व्यक्तियों द्वारा किसी अन्य की निन्दा करने से उत्पन्न वैचारिक समानता का दोनों पर क्या प्रभाव होता है?
उत्तर-(घ) दो व्यक्तियों द्वारा किसी अन्य की निन्दा करने से उत्पन्न वैचारिक समानता का दोनों पर यह प्रभाव होता है कि दोनों के मन शान्त और तृप्त हो जाते हैं। वे अपने विरोधियों की निन्दा एक-दूसरे से सुनते हुए आपस में सहानुभूति का परिचय देते हैं।
(ङ) उपर्युक्त गद्यांश में परस्पर किसकी तुलना की गई है?
उत्तर-(ङ) उपर्युक्त गद्यांश में रात्रि के अन्धकार की दोषों से और दिन के उजाले की स्वच्छ आचरण से तुलना की गई है।
गद्यांश - 3
निन्दा कुछ लोगों की पूँजी होती है। बड़ा लम्बा-चौड़ा व्यापार फैलाते हैं वे इस पूँजी से। कई लोगों की प्रतिष्ठा ही दूसरों की कलंक-कथाओं के पारायण पर आधारित होती है। बड़े रस-विभोर होकर वे जिस – तिस की सत्य-कल्पित कलंक-कथा सुनाते हैं और स्वयं को पूर्ण सन्त समझने की तुष्टि का अनुभव करते हैं।
(क) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
उत्तर-(क) प्रस्तुत गद्यांश प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री हरिशंकर परसाई द्वारा लिखित ‘निन्दा रस’ नामक व्यंग्यात्मक निबन्ध से उद्धृत है। यह निबन्ध हमारी हिन्दी की पाठ्यपुस्तक के गद्य भाग में संकलित है।
(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-(ख)निन्दा करनेवाले व्यक्तियों के विचित्र स्वभाव पर व्यंग्य करते हुए परसाईजी कहते हैं कि कुछ लोग निन्दा को उसी प्रकार महत्त्व देते हैं, जैसे व्यापारी अपनी पूँजी को। वे निन्दा को पूँजी समझते हुए ही अपना व्यापार बढ़ाने में लगे रहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति की अधिक-से-अधिक और सर्वत्र निन्दा करना ही उनके जीवन का प्रमुख लक्ष्य होता है। उनकी यह धारणा होती है कि वे जितनी अधिक निन्दा करेंगे, उतने ही अधिक लाभ उन्हें प्राप्त होंगे। कुछ लोगों को तो प्रतिष्ठित होने का अवसर भी इसीलिए प्राप्त हो पाता है कि वे दूसरों की निन्दा करने में कुशल होते हैं।
(ग) कुछ लोग निन्दा को किस प्रकार महत्त्व देते हैं?
उत्तर-(ग) कुछ लोग निन्दा को इसी प्रकार महत्त्व देते हैं, जिस प्रकार व्यापारी अपनी पूँजी को महत्त्व देता है।
(घ) निन्दा को अपनी पूँजी समझकर निन्दक प्रवृत्ति के लोग क्या करते हैं?
उत्तर-(घ) निन्दा को अपनी पूँजी समझकर निन्दक-प्रवृत्ति के लोग अपना व्यापार बढ़ाने में लगे रहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति की अधिक-से-अधिक और सर्वत्र निन्दा करना ही उनके जीवन का प्रमुख लक्ष्य होता है। उनकी यह धारणा होती है कि वे जितनी अधिक निन्दा करेंगे, उतने ही अधिक लाभ उन्हें प्राप्त होंगे।
(ङ) निन्दक दूसरों की निन्दा करने में किस प्रकार तल्लीन हो जाते हैं?
उत्तर-(ङ) निन्दक दूसरों की निन्दा करने में इसी प्रकार तल्लीन हो जाते हैं, जैसे सन्त भगवान् का भजन करते समय तल्लीन होता है।
(च) दूसरों के प्रति काल्पनिक दुष्प्रचार करके निन्दक स्वयं को क्या समझने लगते हैं?
उत्तर-(च) दूसरों के प्रति काल्पनिक दुष्प्रचार करके निन्दक स्वयं को सन्त समझते हुए अपने अहं की तुष्टि करते हैं।
गद्यांश - 4
निन्दा का उद्गम ही हीनता और कमजोरी से होता है। मनुष्य अपनी हीनता से दबता है। वह दूसरों की निन्दा करके ऐसा अनुभव करता है कि वे सब निकृष्ट हैं और वह उनसे अच्छा है। उसके अहं की इससे तुष्टि होती है। बड़ी लकीर को कुछ मिटाकर छोटी लकीर बड़ी बनती है। ज्यों-ज्यों कर्म क्षीण होता जाता है, त्यों-त्यों निन्दा की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है। कठिन कर्म ही ईर्ष्या-द्वेष और इनसे उत्पन्न निन्दा को मारता है। इन्द्र बड़ा ईर्ष्यालु माना जाता है; क्योंकि वह निठल्ला है। स्वर्ग में देवताओं को बिना उगाया अन्न, बे-बनाया महल और बिन-बोये फल मिलते हैं। अकर्मण्यता में उन्हें अप्रतिष्ठित होने का भय बना रहता है, इसलिए कर्मी मनुष्यों से उन्हें ईर्ष्या होती है।
(क) उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
उत्तर-(क) प्रस्तुत गद्यांश प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री हरिशंकर परसाई द्वारा लिखित ‘निन्दा रस’ नामक व्यंग्यात्मक निबन्ध से उद्धृत है। यह निबन्ध हमारी हिन्दी की पाठ्यपुस्तक के गद्य भाग में संकलित है।
(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-(ख)मनुष्य के हीन भाव और उसकी कर्महीनता से निन्दा का जन्म होता है। जब व्यक्ति में हीनता की भावना प्रवेश कर जाती है तो वह आलसी हो जाता है और उसकी कर्म-शक्ति क्षीण हो जाती है। तब वह निन्दा का सहारा लेकर स्वयं को ऊँचा दिखाने का प्रयास करता है और अपनी हीनता को छिपाने का प्रयत्न करता है। इस प्रकार का व्यक्ति आत्महीनता के बोझ से दबा रहता है। हीनभावना से ग्रस्त व्यक्ति दूसरों की निन्दा करके तथा उन्हें तुच्छ और निकृष्ट बताकर अपने अहम् की तुष्टि करते हैं। वे समझते हैं कि इस प्रकार वे समाज में अपने महत्त्व की स्थापना कर रहे हैं। उनका यह प्रयास ऐसा ही है, जैसे कोई व्यक्ति बड़ी लकीर को कुछ मिटाकर अपनी छोटी लकीर को बड़ी लकीर समझने लगे। जैसे-जैसे व्यक्ति कर्महीन होता जाता है, वैसे-वैसे उसमें निन्दा की प्रवृत्ति बढ़ती चली जाती है। कर्मठ व्यक्ति में न तो ईर्ष्या और द्वेष का भाव होता है और न उसमें निन्दा की प्रवृत्ति होती है। वस्तुतः अपनी कर्मशीलता के क्षणों में उसे इन बातों का ध्यान भी नहीं रहता।
(ग) निन्दा का उद्गम किससे होता है?
उत्तर-(ग) निन्दा का उद्गम व्यक्ति की हीनता और उसकी कर्महीनता के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुई कमजोरी से होता है। जब व्यक्ति में हीनता की भावना प्रवेश कर जाती है तो वह आलसी हो जाता है और उसकी कर्म-शक्ति क्षीण हो जाती है। तब वह निन्दा का सहारा लेकर स्वयं को ऊँचा दिखाने का प्रयास करता है और अपनी हीनता को छिपाने का प्रयत्न करता है
(घ) “बड़ी लकीर को कुछ मिटाकर छोटी लकीर बड़ी बनती है।” इस वाक्य में लेखक का क्या भाव निहित है?
उत्तर-(घ) “बड़ी लकीर को कुछ मिटाकर छोटी लकीर बड़ी बनती है।” इस वाक्य में लेखक का यह भाव निहित है कि हीनता से ग्रस्त व्यक्ति दूसरों की निन्दा करके तथा उन्हें तुच्छ एवं निकृष्ट बताकर अपने अहं की तुष्टि करता है। वह समझता है कि इस प्रकार से वह समाज में अपना स्थान बना रहा है। उसका यह प्रयास इस प्रकार का होता है, मानो कोई व्यक्ति किसी बड़ी लकीर को मिटाकर अपनी छोटी लकीर को बड़ी लकीर समझने लगे।
(ङ) देवताओं को कर्मी मनुष्यों से ईर्ष्या क्यों होती है?
उत्तर-(ङ) देवताओं को कर्मी मनुष्यों से ईर्ष्या इसलिए होती है; क्योंकि स्वर्ग में उन्हें सबकुछ बिना प्रयास के मिल जाता है। उन्हें यह सब पाने के लिए किसी भी प्रकार के कर्म या परिश्रम की आवश्यकता नहीं होती। अपनी अकर्मण्यता के कारण उन्हें अप्रतिष्ठित होने का भय बना रहता है। इसीलिए उन्हें कर्मठ और पुरुषार्थी व्यक्तियों को देखकर ईर्ष्या होती है।
गद्यांश - 5
ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित निन्दा भी होती है। लेकिन इसमें वह मजा नहीं, जो मिशनरी भाव से निन्दा करने में आता है। इस प्रकार का निन्दक बड़ा दुःखी होता है। ईर्ष्या-द्वेष से चौबीसों घंटे जलता है और निन्दा का जल छिड़ककर कुछ शान्ति अनुभव करता है। ऐसा निन्दक बड़ा दयनीय होता है। अपनी अक्षमता से पीड़ित वह बेचारा दूसरे की सक्षमता के चाँद को देखकर सारी रात श्वान जैसा भौंकता है। ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित निन्दा करनेवाले को कोई दण्ड देने की जरूरत नहीं है। वह निन्दक बेचारा स्वयं दण्डित होता है। आप चैन से सोइए और वह जलन के कारण सो नहीं पाता। उसे और क्या दण्ड चाहिए?
(क) गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
उत्तर- (क) प्रस्तुत गद्यांश प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री हरिशंकर परसाई द्वारा लिखित ‘निन्दा रस’ नामक व्यंग्यात्मक निबन्ध से उद्धृत है। यह निबन्ध हमारी हिन्दी की पाठ्यपुस्तक के गद्य भाग में संकलित है।
(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-(ख)निन्दक की यह दशा बड़ी दयनीय होती है। अपने अभावों के कारण वह दुःखी होता हुआ जिस प्रकार कुत्ता रात्रि के अन्धकार को देखकर भौंकता रहता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण रात्रि ईर्ष्या की अग्नि में जलता रहता है। इस प्रकार ईर्ष्या से प्रभावित व्यक्ति को दण्ड की आवश्यकता नहीं होती; क्योंकि वह स्वयं ही अपनी प्रकृति के कारण दुःख प्राप्त करता है। ऐसे व्यक्ति जीवन में किसी प्रकार की उन्नति की अपेक्षा दुःख के भागी होते हैं
(ग) लेखक के अनुसार दो प्रकार के निन्दक कौन-से होते हैं?
उत्तर-(ग) लेखक के अनुसार निन्दक दो प्रकार के होते हैं- प्रथम मिशनरी निन्दक; अर्थात् जिनका स्वभाव ही निन्दा करने का हो और दूसरे ईर्ष्या-द्वेष से प्रेरित निन्दक ।
(घ) परसाईजी के अनुसार ईर्ष्या-द्वेष की अग्नि में जलनेवाले निन्दक की स्थिति किस प्रकार दयनीय होती है?
उत्तर-(घ) परसाईजी के अनुसार ईर्ष्या-द्वेष की अग्नि में जलनेवाले निन्दक की स्थिति इस दृष्टि से, दयनीय होती है कि वह अपने अभावों के कारण दुःखी होता हुआ, जिस प्रकार कुत्ता रात्रि के अन्धकार को देखकर भौंकता रहता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण रात्रि ईर्ष्या की अग्नि में जलता रहता है।
(ङ) ईर्ष्या से प्रभावित व्यक्ति को किसी दण्ड की आवश्यकता क्यों नहीं होती?
उत्तर-(ङ) ईर्ष्या से प्रभावित व्यक्ति को किसी दण्ड की आवश्यकता इसलिए नहीं होती; क्योंकि वह स्वयं ही अपनी प्रकृति के कारण दुःख प्राप्त करता है। ऐसे व्यक्ति अपने जीवन में किसी भी प्रकार की उन्नति की अपेक्षा दुःख के ही भागी होते हैं। उन्हें दण्ड देने की आवश्यकता इसलिए भी नहीं होती; क्योंकि जब दूसरे सुख की नींद सोते हैं, तब वे निन्दक ईर्ष्या की पीड़ा के कारण एक भी पल चैन की नींद नहीं सो पाते।
गद्यांश - 6
कुछ ‘मिशनरी’ निन्दक मैंने देखे हैं। उनका किसी से बैर नहीं, द्वेष नहीं। वे किसी का बुरा नहीं सोचते। पर चौबीसों घंटे वे निन्दा कर्म में बहुत पवित्र भाव से लगे रहते हैं। उनकी नितान्त निर्लिप्तता, निष्पक्षता इसी से मालूम होती है कि वे प्रसंग आने पर अपने बाप की पगड़ी भी उसी आनन्द से उछालते हैं, जिस आनन्द से अन्य लोग दुश्मन की। निन्दा इनके लिए ‘टानिक’ होती है।
(क)उपर्युक्त गद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
उत्तर-(क) प्रस्तुत गद्यांश प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री हरिशंकर परसाई द्वारा लिखित ‘निन्दा रस’ नामक व्यंग्यात्मक निबन्ध से उद्धृत है। यह निबन्ध हमारी हिन्दी की पाठ्यपुस्तक के गद्य भाग में संकलित है।
(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
उत्तर-(ख) कुछ निन्दक मिशनरी प्रचारकों (ईसाई धर्म के प्रचारकों) की तरह निर्लिप्त भाव से अपना कर्त्तव्य करते हैं। उनकी यह निन्दा इस कारण नहीं होती कि उनका किसी से ईर्ष्या-द्वेष है, वे तो उसे एक पवित्र कर्त्तव्य समझकर करते हैं
(ग) प्रस्तुत गद्यांश में ‘मिशनरी’ निन्दक से क्या तात्पर्य है?
उत्तर-(ग) प्रस्तुत गद्यांश में ‘मिशनरी’ निन्दक का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार ईसाई मिशनरी या प्रचारक निर्लिप्त भाव से अपने कर्त्तव्य का निर्वाह करते हैं, उसी प्रकार मिशनरी निन्दक भी निन्दा करना अपना पुनीत कर्त्तव्य समझते हैं।
(घ) मिशनरी निन्दक किस भाव से निन्दा करने में लगे रहते हैं?
उत्तर-(घ) मिशनरी निन्दक ईसाई धर्म प्रचारकों की तरह निर्लिप्त भाव से धर्म प्रचार करने की भावना की तरह निन्दा को अपना पुनीत कर्त्तव्य समझकर दूसरों की निन्दा करते हैं।
(ङ) निन्दा करनेवाले लोग दुश्मन की पगड़ी उछालने के साथ ही और किसकी पगड़ी भी उसी आनन्द से उछालते हैं?
उत्तर-(ङ) निन्दा करनेवाले लोग दुश्मन की पगड़ी उछालने के साथ ही समय आने पर अपने पिता की पगड़ी भी उसी आनन्द से उछालते हैं, जिस प्रकार अपने किसी दुश्मन की। वे अपने पिता की बुराई भी पूरी तन्मयता से करते हैं।
