सुमित्रानन्दन पन्त
साहित्यिक परिचय – छायावादी युग के ख्याती प्राप्त कवि सुमित्रानन्दन पन्त का जन्म 21 मई, 1900 ई० में अल्मोड़ा जिले के कौसानी’ नामक गाँव में हुआ था। इनके पिता पं० गंगादत्त पन्न धार्मिक ब्राह्मण थे। जन्म के छः घण्टे बाद ही इनकी माता सरस्वती देवी का देहान्त हो गया था, इनका पालन-पोषण उनकी बुआ ने किया। पन्त जी की प्रारम्भिक शिक्षा अल्मोडा में हुई। काशी जयनारायण स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा पास की और इण्टर में कॉलेज छोड़कर असहयोग आन्दोलन में सम्मिलित हो गये। सन 1956 ई० में उत्तर प्रदेश सरकार ने इन्हें एक लाख रुपये के भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया। भारत सरकार ने इन्हें ‘पद्मभूषण’ से अलंकृत किया था।
आधुनिक युग के क्रान्तिकारी कवियों में पन्त जी का बहुत ऊँचा स्थान है। निराला की भाँति ही पत्त जी ने भी कविता के लिए भाषा, व्याकरण और छन्दों के बन्धन को मानने से इन्कार कर दिया। इनकी कविता में कमिक विकास दिखाई पड़ता सामान्यतया पन्त जी के काव्य को (1) ‘छायावादी’, और (2) ‘प्रगतिवादी’-दो भागों में बाँटा जाता है परन्तु समय समय पर इनके काव्य में अनेक परिवर्तन साफ दिखाई पड़ते हैं। खड़ी बोली का जो मधुर कोमलकान्त रूप पन्त जी की कृतियों में मिलता है वह अन्यत्र दुर्लभ है। सन् 1977 ई० में इनका स्वर्गवास हो गया !
कृतियाँ – वीणा, ग्रन्थि, उच्छ्वास, पल्लव, गुंजन, युगान्त, युगवाणी, पल्लविनी, स्वर्ण किरण, उत्तरा, परिक्रीड़ा, ज्योत्सना, रानी, हार, पाँच कहानियाँ, उमर खैय्याम की रुबाइयों का हिन्दी अनुवाद ।
महादेवी वर्मा
साहित्यिक परिचय- एक प्रसिद्ध कवयित्री के रूप में प्रसिद्धी प्राप्त करने वाली महादेवी वर्मा का जन्म सन् 1907 ई० में फर्रुखाबाद नगर में हुआ था। उनके पिता भी गोविन्द प्रसाद वर्मा एक अच्छे विद्वान थे। इनकी माता ‘हेमरानी’ भी अच्छी विदुषी थीं। केवल 9 वर्ष की अवस्था में ही इनका विवाह रूपनारायण वर्मा के साथ हो गया। विवाह के बाद एम०ए० तक शिक्षा प्राप्त की, संगीत और चित्रकला में इनकी विशेष रुचि थी। आप प्रयाग महिला विद्यापीठ में प्रधानाचार्या रहीं। उत्तर प्रदेश सरकार ने इन्हें विधान परिषद् की सतस्या नियुक्त किया। भारत के राष्ट्रपति ने इन्हें ‘पद्मश्री’ की उपाधि प्रदान की। हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने इन्हें ‘नीरजा’ पर 500 रु० का सेक्सरिया पुरस्कार तथा ‘यामा’ पर 1200 रु० का ‘मंगला प्रसाद’ पारितोषिक देकर सम्मानित किया। पति-परित्यक्ता होने से इनका जीवन वेदनामय रहा। इनके साहित्य में भी उसी वेदना की टीस है। इन्होंने ‘चाँद’ नामक पत्रिकाका सम्पादन भी किया।सुश्री महादेवी वर्मा बीसवीं शताब्दी की करुण रस की प्रधान कवयित्री हैं। विरह वेदना की गम्भीरता के कारण ही महादेवी को ‘आधुनिक काल की मीरा’ कहा जाता है। महादेवी जी की रचनाओं में चित्रमयता और कल्पनाशीलता पर्याप्त मात्रा में पायी जाती है। सन् 1987 ई० में आपका परलोकवास हो गया।कृतियाँ- महादेवी जी ने गद्य तथा पद्य दोनों में श्रेष्ठ रचनाएँ की हैं। नीहार, रश्मि, नीरजा, सान्ध्य गीत, दीपशिखा, यामा, अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ, श्रृंखला की कड़ियाँ, हिन्दी का विवेचनात्मक गद्य !
जयशंकर प्रसाद
साहित्यिक परिचय – द्विवेदी युग से अपनी काव्य रचना का प्रारम्भ करने वाले महाकवि जयशंकर प्रसाद का जन्म 1889 ई० में काशी में हुआ था। इनके पिता श्री देवीप्रसाद काशी के प्रसिद्ध विक्रेता थे। प्रसाद जी जब 12 वर्ष के ही थे कि इनके पिता परलोकवासी हो गये और घर का सारा भार बालक प्रसाद के कन्धों पर आ पड़ा। सातवीं कक्षा से ही स्कूल की पढ़ाई छोड़नी पड़ी। तत्पश्चात प्रसाद जी ने स्वाध्याय से हिन्दी, संस्कृत अंग्रेजी का ज्ञान प्राप्त किया। बचपन से ही जीवन संघर्षो में बीता। माता की मृत्यु हो गयी। एक के बाद दूसरी पत्नी को संसार से विदा किया। विषम परिस्थितियों में रहकर भी प्रसाद जी ने हिन्दी साहित्य की सेवाएं कीं।
प्रसाद जी की प्रतिभा बहुमुखी थी। वे एक महान कवि, श्रेष्ठ नाटककार, सफल कहानीकार, गम्भीर चिन्तक, लेखक तथा प्रसिद्ध उपन्यासकार थे। प्रसाद जी ने काव्य के विषय तथा क्षेत्र, दोनों में मौलिक परिवर्तन किये। उन्होंने रीतिकाल में बदनाम भंगार रस में सात्विकता का समावेश किया और श्रृंगार रस को पुनः रसराज पद पर स्थापित किया। ये हिन्दी में छायावादी काव्यधारा के प्रवर्तकों में हैं। अधिक श्रम और राजयक्ष्मा से जर्जर 14 नवम्बर, 1937 ई० को 48 वर्ष की अल्पायु में इनका स्वर्गवास हो गया।
कृतियाँ- चित्राधार, कानन कुसुम, करुणालय, महाराणा का राहत्त्व, प्रेम परिक, अरना, आँसू, तहर, कामायनी, राज्यश्री, अजातशत्रु, स्कन्दगुप्त, चन्द्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, विशाख, कामना, जन्मेजय का नागयज, एक घूँट, परिणय, कल्याणी, आकाशदीप, इन्द्रजाल, प्रतिध्वनि, आँधी, चित्राधार की कहानियाँ, कंकाल, तितली, इरावती (अपूर्ण), उर्वशी, प्रेम राज्य, आदि।
सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय'
साहित्यिक परिचय – श्री सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का जन्म सं० 1967 वि० (सन् 1911 ई०) में कश्मीर प्रदेश में हुआ था। इनका बचपन अपने विद्वान पिता के साथ कश्मीर, बिहार और मद्राग में बीता। आपकी शिक्षा लाहौर और मद्रास में हुई। बी०एस-सी० परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद एम० ए० (अँग्रेजी) में प्रविष्ट हुए किन्तु देशप्रेम की प्रेरणा से राजनैतिक आन्दोलन में सम्मिलित हो गये। परिणामस्वरूप पढ़ाई छूट गयी और सन् 1930 ई० में गिरफतार हो गये। चार वर्ष जेल में और दो वर्ष नजरबन्द रहना पड़ा। तत्पश्चात आपने किसान आन्दोलन में भाग लिया और ‘सैनिक’, ‘विशाल भारत’, ‘प्रतीक’ और अँग्रेजी त्रैमासिक ‘बात’ पत्रों का सम्पादन किया। कुछ वर्ष आकाशवाणी में भी कार्य किया। सन् 1946 से 1949 तक देशसेवा में लगे रहे। इसके पश्चात साप्ताहिक ‘दिनमान’ पत्रिका का सम्पादन किया और कुछ समय ‘नया-प्रतीक’ नामक पत्र का भी सम्पादन-कार्य किया । अज्ञेय जी ने अनेक देशों की यात्राएँ भी की हैं। 4 अप्रैल सन् 1987 ई० को इनका स्वर्गवास हो गया।
कृतियाँ –आँगन के पार द्वार, अरी ओ करुणा, प्रभामय, हरी घास पर क्षण भर, इन्द्रधनु रौंदे हुए थे, कितनी नावों में कितनी बार, बावरा अहेरी, इत्यलम्, चिन्ता, पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ, भग्नावदात, सागर मुद्रा आदि।
इनके अतिरिक्त आपने कहानी, उपन्यास, निबन्ध, समीक्षा, भ्रमण वृत्तान्त तथा नाटक आदि विविध गद्य विधाओं में अपने मौलिक व्यक्तित्व को प्रकट किया है।
