स्वास्थ्य शिक्षा का महत्त्व और इसके फायदे

रूपरेखा – 1. प्रस्तावना, 2. शारीरिक एवं मानसिक विकास, 3. सुस्वास्थ्य के लाभ, 4. आज के युग में स्वास्थ्य का महत्त्व, 5. विद्यालयों में स्वास्थ्य शिक्षा की अनिवार्यता, 6. उपसंहार ।

प्रस्तावना

केवल किताबें पढ़ना, सिलेबस पूरा करना या जैसे-जैसे परीक्षा पास कर लेना ही काफी नहीं है। यहाँ तक कि कम योग्यता होने पर भी कोई काम धंधा ढूंढ लेना, या गलत तरीकों से बहुत सारा पैसा कमाकर अमीर बन जाना भी पूरी तरह बेकार है।

यह सब तब व्यर्थ हो जाता है, जब आपका स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता। कम उम्र में ही बाल सफेद होना, कमर झुक जाना, आँखें कमजोर होना, चेहरे की चमक गायब होना और शरीर का कमजोर होकर नष्ट हो जाना जीवन को बेकार बना देता है।

शिक्षा का दायरा बहुत बड़ा है। जीवन तभी पूरा और सफल माना जाता है, जब हम शरीर और मन दोनों से पूरी तरह स्वस्थ हों। स्वस्थ रहकर ही हम सही ज्ञान हासिल कर सकते हैं। तभी हम एक अच्छे चरित्र वाले और ईमानदार इंसान भी बन सकते हैं।

शारीरिक एवं मानसिक विकास

एक अच्छे स्वास्थ्य की पहचान सिर्फ बीमारी से दूर रहना नहीं है। शरीर और मन का स्वस्थ होना, चेहरे पर चमक होना, अच्छा चरित्र, सुख-दुख में धीरज रखना, मिलजुल कर रहना, आपस में सहयोग और सहनशीलता ही असली स्वास्थ्य के लक्षण हैं। अगर हम पढ़ाई करने के बाद भी इन गुणों को नहीं सीख पाते, तो हमारा पढ़ना और यह जीवन पूरी तरह बेकार है। सुंदर, आकर्षक और ऊर्जा से भरा शरीर ही जीवन की असली शोभा है। स्वास्थ्य का मतलब शरीर में चर्बी बढ़ाना या तोंद निकालना नहीं है, बल्कि शरीर का सुडौल, छरहरा और फुर्तीला होना है।

आज के स्कूलों में शारीरिक मेहनत (श्रम) पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। लेकिन सच यह है कि बिना मेहनत के अच्छा स्वास्थ्य पाना असंभव है। मेहनत करने से ही शरीर का सही विकास होता है।

पुराने समय में गुरुकुल की शिक्षा में पढ़ाई के साथ-साथ गुरु की सेवा के बहाने मेहनत करने पर बहुत जोर दिया जाता था। भिक्षा मांगना, लकड़ियाँ इकट्ठा करना, नदी में नहाना और खुले वातावरण में रहना—ये कुछ ऐसे काम थे जिससे छात्र पढ़ाई के साथ-साथ अपना स्वास्थ्य भी मजबूत कर लेते थे। इसके अलावा तीरंदाजी और खेलकूद की तैयारियाँ जैसी गतिविधियाँ छात्रों को पूरी तरह सेहतमंद बनाती थीं। शरीर और मन के सही विकास के लिए स्वास्थ्य से जुड़ी यह शिक्षा बहुत जरूरी थी।

सुस्वास्थ्य के लाभ

शरीर की ताकत इंसान को ऊर्जावान और चमकदार बनाती है। यह ऊर्जा ब्रह्मचर्य का पालन करने से मिलती है। विद्यार्थी जीवन पूरी तरह ब्रह्मचर्य पर ही टिका होता है, इसीलिए पुराने समय में छात्र को ‘ब्रह्मचारी’ भी कहा जाता था। ब्रह्मचारी का अर्थ है वह व्यक्ति जिसे सत्य या ईश्वर को पाने का रास्ता पता हो। इसलिए पढ़ाई के दिनों में शरीर को मजबूत बनाना बहुत जरूरी माना जाता था।

चाहे पुराने समय के खेल हों जैसे कबड्डी, तैरना, घुड़सवारी और कुश्ती, या फिर आज के आधुनिक खेल जैसे फुटबॉल, वॉलीबॉल, टेनिस, क्रिकेट और हॉकी ये सभी खेल छात्रों के शरीर के विकास, ताकत और मजबूती के लिए हमेशा जरूरी रहे हैं और रहेंगे।

शारीरिक ताकत, काम करने की क्षमता, मानसिक ताजगी और खुशहाली ही अच्छे स्वास्थ्य की असली चाबी हैं। एक स्वस्थ व्यक्ति को समाज में भी बहुत सम्मान मिलता है। हमारे यहाँ कहा गया है कि ‘पहला सुख निरोगी काया’ (यानी सबसे बड़ा सुख स्वस्थ शरीर है) और ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ (यानी जीवन के सभी अच्छे काम और कर्तव्य पूरे करने का पहला साधन शरीर ही है)। ये बातें हमें स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करती हैं। अगर शरीर स्वस्थ है, तो हमारे पास सब कुछ है और हम जीवन के सभी लाभ उठा सकते हैं।

आज के युग में स्वास्थ्य का महत्त्व

हमारा पूरा जीवन स्वास्थ्य पर ही टिका हुआ है। हम जीवन में सफल होंगे या असफल, यह काफी हद तक हमारी सेहत तय करती है। अच्छी सेहत एक ऐसा धन है जो हमें जीवन की हर लड़ाई जीतने में मदद करता है। अगर हम बीमार या अस्वस्थ हैं, तो हमारा मन न तो पढ़ाई में लगेगा, न घर के कामों में और न ही समाज के किसी काम में। एक अस्वस्थ व्यक्ति अपने परिवार, समाज और देश के लिए बोझ बन जाता है। इसलिए हमें सेहतमंद रहने के नियम अपनाने चाहिए ताकि हम देश की तरक्की में अपना योगदान दे सकें।

ज्ञान, ताकत, मेहनत और अच्छे स्वास्थ्य को बढ़ाना हमारा सबसे बड़ा कर्तव्य है। शारीरिक ताकत बढ़ाने के साथ-साथ मनोरंजन भी बहुत जरूरी है। मनोरंजन के लिए हम चौपड़, शतरंज, ताश और कैरम जैसे खेल खेल सकते हैं, क्योंकि खुश रहने का स्वास्थ्य से सीधा संबंध है।

आज के इस भीड़भाड़ वाले दौर में हमें कीड़े-मकोड़ों की तरह घिसट-घिसट कर नहीं जीना है। अपने शरीर को मजबूत और ताकतवर बनाने के लिए हमें कड़ी मेहनत और खेलकूद को अपनाना होगा। तभी हमें समाज में सच्चा सम्मान और प्रतिष्ठा मिलेगी।

विद्यालयों में स्वास्थ्य शिक्षा की अनिवार्यता

स्कूलों में स्वास्थ्य शिक्षा को एक ज़रूरी (अनिवार्य) विषय के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। इससे हर छात्र पढ़ाई के साथ-साथ सेहत से जुड़ी सभी ज़रूरी बातें अच्छी तरह सीख सकेगा। अच्छी पढ़ाई और ऊँचे जीवन मूल्यों को पाने के लिए स्वास्थ्य शिक्षा बहुत ज़रूरी है। जीवन तभी पूरा होता है जब शरीर और मन दोनों का सही विकास हो।

स्वास्थ्य शिक्षा के ज़रिए छात्र न केवल शारीरिक ताकत पाते हैं, बल्कि खेल-खेल में ही जीवन के बड़े-बड़े आदर्श भी सीख लेते हैं। वे जीवन के उतार-चढ़ाव और संघर्षों का बिना घबराए, धीरज और सहनशीलता के साथ सामना करना सीखते हैं। इससे छात्र कड़ी मेहनत करना सीखते हैं और अपनी अद्भुत ताकत के बल पर कामयाबी हासिल करते हैं। यह सब तभी मुमकिन है जब स्कूलों में खेलकूद के साथ स्वास्थ्य शिक्षा को ज़रूरी विषय बनाया जाए।

उपसंहार

जीवन को ताक़त और सुंदरता से भरने के लिए हर छात्र को स्वास्थ्य शिक्षा मिलना बहुत ज़रूरी है। एक सभ्य समाज में जहाँ ज्ञान को सम्मान मिलता है, वहीं एक अच्छा और आकर्षक स्वास्थ्य भी सभी को सुखद आदर दिलाता है। अगर हम अपने देश, समाज और परिवार में एक ऊँचा मुकाम हासिल करना चाहते हैं, तो हमें ज्ञान के साथ-साथ स्वास्थ्य शिक्षा भी पानी होगी। किताबी ज्ञान के साथ खेलकूद और सेहत की जानकारी होना बेहद ज़रूरी है।

सुखी रहना हर जीव का बुनियादी अधिकार है। इस सुख को पाने के लिए छात्रों को आगे आना होगा, मेहनत के मैदान में उतरना होगा और अपनी कोशिशों से अपने लक्ष्य को पाना होगा। किसी भी छात्र के व्यक्तित्व का पूरा विकास उसके शरीर और बुद्धि दोनों के मजबूत होने पर निर्भर करता है। खेल और स्वास्थ्य शिक्षा की मजबूत नींव पर ही बुद्धि का बड़ा महल खड़ा किया जा सकता है। इसलिए जीवन में स्वास्थ्य शिक्षा का लाभ उठाना बहुत ज़रूरी है। यह स्वास्थ्य शिक्षा हमारे जीवन रूपी बगीचे में ज्ञान के सुंदर फूल खिलाएगी।